जुनून ए जन्नत

शहर भी है और है जहन्नम भी
देखना अब ये है के बचता है
आगबबुले धुएँका टावर,
माडर्न एजकी लिपीपुतीसी फर्माईशे
या तेरा जुनून ए जन्नत जुनून ए जन्नत वाचन सुरू ठेवा

जनमदिन

कल, मार्चकी दूसरी तारीखको मेरा जनमदिन था. मेरी उम्रमें इक साल और बढ गया कल. दिन गुजरते गुजरते मै कुछ लिख पाया… वहीं दो कवितायें एकसाथ यहां पोस्ट कर रहा हूं.

जनमदिन वाचन सुरू ठेवा

आपकी अधफिक्र नजर

बडी मुद्दत बाद मिले थे
तो बडे प्यारसे हमने हाथ
आपके कंधोपर हल्कासा रख दिया

आपकी अधफिक्र नजर वाचन सुरू ठेवा

मां

ना देखूं तेरी आंखोंमे
के दिखते है गठ्ठे खूनभरे
मां वाचन सुरू ठेवा

बूंदे

साधारणतः चुभते रहते है चीच पार्श्वभूमी. कदाचित तीच सेम कॅरेक्टर्स, तेच जोडपं. पुढची कविता… बूंदे वाचन सुरू ठेवा

चुभते रहते है

सामनेसे आती गाडियोंके हेडलाईटोंकी गर्म पिली रोशनी
ऐसे आखोंको चीर जाती है
चुभते रहते है वाचन सुरू ठेवा

परछाईयां

पिली पिलीसी धूप में
मूंदी मूंदीसी आंखे मेरी
ढूंढ रही… इश्क की परछाईयां

क्रांती

क्रांती
जमानेसे कहदो कुछ होनेवाला है
आग तो लग चुकी है
जलाकर राख कर देनेवाली है
तितलियाँ बदल चुकी है बाझोंमे
बस अब आसमाँ छुनेवाली है
खून खौल उठा है युवकोंका
एक क्रांती होनेवाली है
जमानेसे कहदो कुछ होनेवाला है
शुरुआत हो चुकी है
अब सुलगना बाकी है
चाहे आ जाए सारे राक्षस
उन्हे मार डालेंगे हम
कलियुग अब जा चुका है
पर सत्ययुग आना बाकी है
जमानेसे कहदो क्रांती होनेवाली है
बुराई का अंधःकार हटाकर
अच्छाई की किरने लानेवाली है
जमानेसे कहदो क्रांती होनेवाली है
आतंक का महल जलाकर
शांती का कारवाँ लानेवाली है
ऐसी क्रांती होनेवाली है

मेरी यह कविता पढनेवाले मेरे सारे दोस्तोंसे यह रिक्वेस्ट है के, अगर कुछ ग्रॅमॅटिकल मिस्टेक्स अगर मुझसे हुई है तो मुझे माफ कर दिजीयेगा…

धन्यवाद